हरिवंशराय बच्चन के पत्र से खुला बच्चन परिवार का बड़ा राज, बीएससी के बाद पढ़ना नहीं चाहते थे हमारे अमिताभ बच्चन
हरिवंशराय बच्चन ने 24 अप्रैल 1963 को निरंकार देव सेवक को भेजे पत्र में यह उल्लेख किया था।वह लिखते हैं कि भाई निरंकार, मेरा कार्ड मिल गया होगा। तुम्हें जमीन मिल गई है तो जरूर ले लो। मेरे पास न तो जमीन खरीदने को रुपया है न मकान बनाने को।मकान भी बना लो।एक छोटा काटेज ऐसा भी सोचकर बना लो कि यह बच्चन के लिए है।शायद रिटायर होकर तुम्हारे पास ही आ जाऊं।
सबसे पहले उनके नाम के साथ बच्चन जुड़ने की कहानी
बच्चन साब के नाम की कहानी बड़ी दिलचस्प है। हरिवंश राय बच्चन के माता-पिता की दो संताने पैदा होते ही चल बसी थीं। ऐसे में इनके पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव अपने परिवार को लेकर फिक्र में थे। अपने मन का दर्द लेकर एक पंडित के पास पहुंचे। पंडित ने उनको सलाह दी कि आप हरिवंश पुराण सुनिए। घर में हरिवंश पुराण सुना गया। इसके कुछ दिन बाद घर में नया मेहमान आया तो पुराण के नाम पर ही बच्चे को नाम दिया गया हरिवंश राय। पिता से सरनेम मिला तो पूरा नाम हुआ हरिवंश राय श्रीवास्तव।
दुआओं और मन्नतों से पैदा हुए इस लाडले बच्चे को घर में सब बच्चन-बच्चन बुलाते। घर के लोग बुलाते तो पड़ोस के लिए भी वो बच्चन हो गए और रिश्तेदारों के लिए भी। ये बच्चन उनके साथ ऐसा जुड़ा कि सरनेम ही श्रीवास्तव के बजाय बच्चन हो गया। तो नाम मिला हरिवंश राय बच्चन।
बच्चन साब ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए और एमए किया था और कैब्रिज से पीएचडी। उन्होंने अंग्रेजी में पढ़ाई की लेकिन कविता लिखी हिन्दी में। हिन्दी अंग्रेजी के साथ-साथ फारसी और उर्दू पर भी उनकी तगड़ी पकड़ थी।
19 साल की उम्र में हुई थी पहली शादी
पढ़ाई के दौरान ही 19 साल की उम्र में श्यामा बच्चन के साथ उनकी शादी हो गई। शादी के बाद नौकरी भी मिल गई। सब ठीक चल रहा था। 1935 में उनकी मधुशाला प्रकाशित हुई। मधुशाला ने तो तहलका मचा दिया। मधुशाला से उनको जो प्रसिद्धि मिली, उसने उनकी शोहरत को अर्श पर पहुंचा दिया। लेकिन निदा फाजली का शेर है कि
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।
एक और हरिवंश राय की शोहरत बढ़ रही थी तो दूसरी ओर उनकी पत्नी श्यामा की हालत टीबी के चलते बिगड़ती चली जा रही थी। उस दौर में आज की तरह टीबी का इलाज नहीं था। श्यामा जी की बीमारी बढ़ती रही और 1936 में श्यामा दुनिया छोड़ गईं।
बच्चन साब के लिए ये बड़ा सदमा था। पत्नी की मौत ने उनको अकेला कर दिया था। पत्नी के जाने का असर उनकी सेहत पर भी पड़ने लगा लेकिन जिस कवि ने लिखा हो-
नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!
नीड़ यानी घोंसला। बार-बार घोंसला बनाते रहने की बात कहने वाले बच्चन साब ने खुद को इस मुश्किल वक्त से निकाल लिया। इसमें उनके लिए बड़ा सहारा बनकर आईं तेजी सूरी।
ऐसे हुई तेजी से मुलाकात
बच्चन साब की तेजी सूरी से मुलाकात प्रेम प्रकाश जौहरी ने कराई थी। जौहरी साब और बच्चन साब दोस्त थे। तो जौहरी की पत्नी तेजी को जानती थीं। दरअसल जौहरी चाहते थे कि तेजी सूरी और हरिवंश राय बच्चन मिल लें।
जौहरी साब ने एक दिन बच्चन साब को पता भेजकर बरेली बुलाया। बरेली प्रेम प्रकाश जौहरी ने तेजी सूरी को भी बुलाया हुआ था। यहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई। मुलाकातें आगे बढ़ीं और 1941 में दोनों ने शादी कर लीं।
तेजी बच्चन का झुमका गिरा था बरेली के बाजार में
गीतकार राजा मेहदी साहब और हरिवंश बच्चन में अच्छी दोस्ती थी। राजा मेहदी साहब अपने काम के सिलसिले में एक बार बरेली आए हुए थे। उस वक्त तक हरिवंश जी और तेजी जी की शादी नहीं हुई थी।
राजा मेहदी साहब ने तेजी से सवाल कर दिया कि आखिर आप और हरिवंश जी शादी कब कर रहे हैं? तेजी जी का जवाब आया- मेहदी साब मेरा झुमका तो बरेली के बाजार में गिर गया'
राजा मेहदी को ये जुमला ऐसा याद रहा कि 30 साल बाद 1969 में फिल्म साया के लिए उन्होंने गीत लिखा- 'झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में।'
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