हरिवंशराय बच्चन के पत्र से खुला बच्चन परिवार का बड़ा राज, बीएससी के बाद पढ़ना नहीं चाहते थे हमारे अमिताभ बच्चन

Ravi Gangwar 
बालीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का कद फिल्म इंडस्ट्री में जितना बड़ा है, उससे कम उनका संघर्ष भी नहीं है।अमिताभ बच्चन ने यह मुकाम हासिल करने में अथक प्रयास किये। अमिताभ बच्चन ने बीएससी करने के बाद आगे पढ़ाई करने से इन्कार कर दिया था।वह नौकरी करके अपने करियर को संवारना चाहते थे। प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन ने बरेली के बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक को लिखे पत्र में इसका जिक्र किया था।हरिवंश राय खुद भी बरेली में बसने की इच्छा रखते थे!!!!!


हरिवंशराय बच्चन ने 24 अप्रैल 1963 को निरंकार देव सेवक को भेजे पत्र में यह उल्लेख किया था।वह लिखते हैं कि भाई निरंकार, मेरा कार्ड मिल गया होगा। तुम्हें जमीन मिल गई है तो जरूर ले लो। मेरे पास न तो जमीन खरीदने को रुपया है न मकान बनाने को।मकान भी बना लो।एक छोटा काटेज ऐसा भी सोचकर बना लो कि यह बच्चन के लिए है।शायद रिटायर होकर तुम्हारे पास ही आ जाऊं।
हमारी अवधी में एक गीत गाते हैं, ' ना जानै राम कहां लागै माटी', पता क्या बरेली की ही माटी बदी हो।पिछले नवंबर में मुझे रिटायर होना था पर अब तीन बरस की अवधि और बढ़ गई है।अमित यानी कि अमिताभ बच्चन बीएससी कर चुके हैं।आगे पढ़ना नहीं चाहते हैं।किसी फर्म की नौकरी की तलाश में हैं।अजित ने सीनियर कैंब्रिज किया।अभी तीन-चार वर्ष उन्हें पढ़ना है।
बच्चन यह भी लिखते हैं कि नेशनल डिफेंस कौंसिल की ओर से कवियों लेखकों को मोर्चा देखने के लिए अभी तो नहीं भेजा रहा है।मोर्चा है भी कहां ! युद्ध संबंधी तुम्हारी रचनाएं देखीं देश को शब्द से कुछ ज्यादा मजबूत चीजें चाहिएं।आशा है बहुरानी और बच्चा सानंद हैं।


सस्नेह बच्चन

1963 में हरिवंश राय के पास नहीं थे घर बनवाने के लिए रुपये

प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन की कविताएं देश दुनियां में अपनी पहचान बना रही थीं लेकिन उनके पास सेवानिवृत्त होने के समय यानी कि वर्ष 1963 में घर बनवाने के रुपये नहीं थे।हरिवंशराय ने आठ अप्रैल 1963 को निरंकार देव सेवक को लिखे पत्र में लिखा था कि प्रिय निरंकार, 15 अगस्त 1962 को तुम्हारा पत्र मिला था।

मैं इधर कुछ अधिक कार्य व्यस्त रहा जिससे उत्तर न दे सका।आशा है तुमने वह जमीन ले ली है।घर बनाने की बात मैंने फिलहाल तो अपने मन से निकाल दी है।रिटायर होने पर कुछ न कुछ प्रबंध करना होगा। वैसे मेरे पिता का बनवाया एक घर इलाहाबाद में है। कुछ और प्रबंध न हुआ तो उसमें तो हम लोग जाकर रह ही सकते हैं।

घर पक्का है और काफी बड़ा है, और उसकी स्थिति भी खराब नहीं है। जमुना के किनारे है। पता नहीं तुमने वह घर देखा कि नहीं, तुम्हारा घर बन जाए तो देखने बरेली आऊंगा। तेजी और बच्चे अच्छे हैं। आशा है तुम सपरिवार स्वस्थ प्रसन्न हो। अजित सीनियर कैंब्रिज परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। 
तुम्हारा बच्चन

सबसे पहले उनके नाम के साथ बच्चन जुड़ने की कहानी


बच्चन साब के नाम की कहानी बड़ी दिलचस्प है। हरिवंश राय बच्चन के माता-पिता की दो संताने पैदा होते ही चल बसी थीं। ऐसे में इनके पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव अपने परिवार को लेकर फिक्र में थे। अपने मन का दर्द लेकर एक पंडित के पास पहुंचे। पंडित ने उनको सलाह दी कि आप हरिवंश पुराण सुनिए। घर में हरिवंश पुराण सुना गया। इसके कुछ दिन बाद घर में नया मेहमान आया तो पुराण के नाम पर ही बच्चे को नाम दिया गया हरिवंश राय। पिता से सरनेम मिला तो पूरा नाम हुआ हरिवंश राय श्रीवास्तव।

दुआओं और मन्नतों से पैदा हुए इस लाडले बच्चे को घर में सब बच्चन-बच्चन बुलाते। घर के लोग बुलाते तो पड़ोस के लिए भी वो बच्चन हो गए और रिश्तेदारों के लिए भी। ये बच्चन उनके साथ ऐसा जुड़ा कि सरनेम ही श्रीवास्तव के बजाय बच्चन हो गया। तो नाम मिला हरिवंश राय बच्चन।

बच्चन साब ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए और एमए किया था और कैब्रिज से पीएचडी। उन्होंने अंग्रेजी में पढ़ाई की लेकिन कविता लिखी हिन्दी में। हिन्दी अंग्रेजी के साथ-साथ फारसी और उर्दू पर भी उनकी तगड़ी पकड़ थी।

19 साल की उम्र में हुई थी पहली शादी
पढ़ाई के दौरान ही 19 साल की उम्र में श्यामा बच्चन के साथ उनकी शादी हो गई। शादी के बाद नौकरी भी मिल गई। सब ठीक चल रहा था। 1935 में उनकी मधुशाला प्रकाशित हुई। मधुशाला ने तो तहलका मचा दिया। मधुशाला से उनको जो प्रसिद्धि मिली, उसने उनकी शोहरत को अर्श पर पहुंचा दिया। लेकिन निदा फाजली का शेर है कि

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।

एक और हरिवंश राय की शोहरत बढ़ रही थी तो दूसरी ओर उनकी पत्नी श्यामा की हालत टीबी के चलते बिगड़ती चली जा रही थी। उस दौर में आज की तरह टीबी का इलाज नहीं था। श्यामा जी की बीमारी बढ़ती रही और 1936 में श्यामा दुनिया छोड़ गईं।

बच्चन साब के लिए ये बड़ा सदमा था। पत्नी की मौत ने उनको अकेला कर दिया था। पत्नी के जाने का असर उनकी सेहत पर भी पड़ने लगा लेकिन जिस कवि ने लिखा हो-

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

नीड़ यानी घोंसला। बार-बार घोंसला बनाते रहने की बात कहने वाले बच्चन साब ने खुद को इस मुश्किल वक्त से निकाल लिया। इसमें उनके लिए बड़ा सहारा बनकर आईं तेजी सूरी।

ऐसे हुई तेजी से मुलाकात
बच्चन साब की तेजी सूरी से मुलाकात प्रेम प्रकाश जौहरी ने कराई थी। जौहरी साब और बच्चन साब दोस्त थे। तो जौहरी की पत्नी तेजी को जानती थीं। दरअसल जौहरी चाहते थे कि तेजी सूरी और हरिवंश राय बच्चन मिल लें।

जौहरी साब ने एक दिन बच्चन साब को पता भेजकर बरेली बुलाया। बरेली प्रेम प्रकाश जौहरी ने तेजी सूरी को भी बुलाया हुआ था। यहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई। मुलाकातें आगे बढ़ीं और 1941 में दोनों ने शादी कर लीं।

तेजी बच्चन का झुमका गिरा था बरेली के बाजार में

गीतकार राजा मेहदी साहब और हरिवंश बच्चन में अच्छी दोस्ती थी। राजा मेहदी साहब अपने काम के सिलसिले में एक बार बरेली आए हुए थे। उस वक्त तक हरिवंश जी और तेजी जी की शादी नहीं हुई थी।

राजा मेहदी साहब ने तेजी से सवाल कर दिया कि आखिर आप और हरिवंश जी शादी कब कर रहे हैं? तेजी जी का जवाब आया- मेहदी साब मेरा झुमका तो बरेली के बाजार में गिर गया'

राजा मेहदी को ये जुमला ऐसा याद रहा कि 30 साल बाद 1969 में फिल्म साया के लिए उन्होंने गीत लिखा- 'झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में।'


कवि सम्मेलन में रुपयों के लिए लड़ पड़े थे हरिवंश राय

हरिवंश राय बच्चन के कई किस्से मशहूर हैं। इलाहाबाद के कवि यश मालवीय बताते हैं कि पहले कवियों को कोई पैसा कवि सम्मेलन में जाने का नहीं मिलता था। 1954 में इलाहाबाद के पुराने शहर जानसेनगंज में एक कवि सम्मेलन हो रहा था। हरिवंश राय बच्चन भी इसमें बुलाए गए।

बच्चन साब को पता चला सिर्फ वाह-वाह से ही काम चलाना होगा। बस फिर क्या था उन्होंने कहा मैं कविता नहीं पढ़ूंगा। आयोजकों ने खुशामदें की और बच्चन साहब को 101 रुपए दिए गए। इसके बाद तो सभी कवियों को पैसा मिलने लगा।


फिल्मों के लिए गीत भी लिखे

हरिवंश जी ने फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। उनकी कुछ कविताओं को भी फिल्मों में इस्तेमाल किया गया है। उनके बेटे अमिताभ बच्चन की फिल्म अग्निपथ में उनकी ये कविताकिसके रोंगटे नहीं खड़ी कर देती है। जब अमिताभ स्क्रीन पर कहते हैं-

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु स्वेद रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

राज्यसभा के सांसद भी रहे हरिवंश राय बच्चन

हरिवंश राय बच्चन बच्चन 1966 से 1972 तक राज्यसभा एमपी रहे। 1976 में बच्चन साब को पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। जीवन के मर्म को समझने वाले और हमेशा आगे बढ़ने की बात कहने वाला ये कवि 2003 में इस दुनिया को छोड़ किसी दूसरी दुनिया को चला गया। आज भी मन उदास हो तो उनका लिखा याद आता है-

किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अंधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है।

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