Communal violence bill 2011 यूपीए सरकार का खात्मा सरकार के इस बिल पर भी हुआ था खूब हंगामा
रवि पटेल (Ravi Patel)
सोनिया गांधी ने खुद किया था कांग्रेस का खात्मा
2011 में यूपीए सरकार के दौरान सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम बिल (Prevention of Communal Violence Bill 2011) पेश किया गया था. इस बिल को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (National Advisory Council) ने तैयार किया था.
इस परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी थी. सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए लाए इस बिल का बीजेपी ने जबरदस्त विरोध किया था. बीजेपी का आरोप था कि इस बिल के जरिए सरकार धर्म के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है. बीजेपी ने इस बिल को सोनिया गांधी का काला कानून करार दिया था.
बीजेपी का आरोप था कि सांप्रदायिक दंगा निवारण बिल 2011 देश की हिंदू आबादी के खिलाफ है. इस बिल को जानबूझकर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से तैयार किया गया है. इस बिल के प्रावधान ऐसे थे, जो साफतौर पर धर्म और जाति के आधार पर बंटवारा करने वाले थे.
बिल में बहुसंख्यकों को माना था दंगा फैलाने का जिम्मेदार
सांप्रदायिक दंगा निवारण बिल में समूहों का बंटवारा बहुसंख्यक आबादी और अल्पसंख्यक आबादी के आधार पर किया गया था. बिल में धार्मिक, जातीय और भाषाई आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आबादी की पहचान की गई थी. बिल के प्रावधान के मुताबिक अगर किसी इलाके में कोई दंगा होता है तो इसके लिए उस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा.
अल्पसंख्यक आबादी की दंगों में भूमिका मुकदमा लिखाने के बाद खत्म मान ली जाएगी. अगर बहुसंख्यक आबादी के किसी शख्स के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है तो उस शख्स की जिम्मेदारी बनती है कि वो खुद को निर्दोष साबित करे. इस बिल के मुताबिक अगर हिंदू बहुल इलाके में हिंदू-मुस्लिम दंगा होता है तो ऐसे में हिंदुओं पर ये जिम्मेदारी होगी कि वो खुद को निर्दोष साबित करें।
बिल में अल्पसंख्यक आबादी को बहुत ज्यादा राहत दी गई थी. बिल के प्रावधानों को देखने पर ऐसा लगता था, मानों ये मान लिया गया हो कि दंगा सिर्फ बहुसंख्यक आबादी फैलाती है.
बीजेपी ने कहा था बिल हिंदुओं के खिलाफ
बीजेपी ने आरोप लगाया था कि सरकार के इस बिल से ऐसा लगता है कि दंगे सिर्फ हिंदू फैलाते हैं. बीजेपी ने इस बिल को हिंदू विरोधी और धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाला बताया था. समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने भी यूपीए सरकार के इस बिल का विरोध किया था. उस वक्त अरुण जेटली ने एक कॉलम में इस बिल के बारे में लिखा था कि 'विधेयक का मसौदा इस धारणा को जन्म देता है कि सांप्रदायिक गड़बड़ी सिर्फ बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों की ओर से की जाती है. अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ऐसा कभी नहीं करते.'
बताया जाता है कि इस बिल को 2002 के गुजरात दंगों को ध्यान में रखकर बनाया गया था. 2004 के लोकसभा चुनाव में इस बिल का वादा कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में किया था.
जानकारों का कहना था कि सिर्फ 2002 के दंगों को ध्यान में रखकर ऐसा बिल बनाना कांग्रेस की बेवकूफी थी. अगर हर दंगे के लिए बहुसंख्यक आबादी को ही जिम्मेदार मान लिया जाए तो क्या 1992 और 1993 के मुंबई दंगों के लिए हिंदू आबादी ने साजिश रची थी?
बिल पर लगा था संविधान के उल्लंघन का आरोप
इस बिल को भारत के संघीय ढांचे पर चोट करने वाला बताया गया था. कानून और व्यवस्था का मामला राज्य सरकारों का है. जबकि बिल में इस मसले पर केंद्र सरकार को भी अधिकार दिए गए थे. इस बिल में हिंसा ज्यादा फैलने पर केंद्र को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया था.
इस बिल की एक धारा पर काफी विवाद हुआ था. सांप्रदायिक दंगा निवारण बिल 2011 की धारा सात के मुताबिक दंगों की स्थिति में बहुसंख्यक आबादी की महिला के साथ रेप होता है तो इस बिल के मुताबिक वो अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा. बहुसंख्यक आबादी की महिला इस बिल के मुताबिक समूह की परिभाषा में नहीं आएंगी. आईपीसी के तहत मामला रेप का होगा लेकिन इस कानून के मुताबिक नहीं.
इसी तरह से इस बिल के मुताबिक अगर मुसलमानों और अनुसूचित जाति और जनजातियों के बीच दंगे की स्थिति बनती है और एससी एसटी उस इलाके में बहुसंख्यक आबादी में आते हों तो ये बिल मुसलमानों का साथ देगा. ऐसे में एससी एसटी एक्ट निष्प्रभावी हो जाएगा.
यूपीए-1 के दौरान 2005 में पहली बार इस बिल का मसौदा तैयार हुआ था. लेकिन इसकी काफी आलोचना हुई थी. उसके बाद 2011 में इसे फिर से लाया गया. 2014 में इस बिल पर संसद में जबरदस्त बहस हुई. बीजेपी के जबरदस्त विरोध के बाद यूपीए ने इस बिल को वापस ले लिया था.

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